जानिए उत्तराखंड के लोक पर्व खतड़वा के बारे में: कब और कैसे मनाया जाता है।

आज उत्तराखंड का लोक पर्व खतडुवा बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड की संस्कृति और परंपराएं अनमोल हैं। जहां कुल देवता, स्थान देवता, भू देवता, वन देवता, पशु देवता और ना जाने कितनी पूजाओं का प्रावधान है, जो ये साबित करता है कि उत्तराखंड के लोग प्रकृति के काफी करीब हैं। ऐसा ही एक पर्व है खतड़वा। ये एक ऐसा पर्व है, जिसे पशुओं की मंगलकामना का पर्व कहा जाता है।

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मान्यता है कि बरसात में गाय और अन्य पशुओं को कई तरह की बीमारी होती है। बरसात खत्म होने और शरद ऋतु के प्रारंभ में पशुओं के रोग-व्याधियों को भगाने के लिए खतड़वा मनाया जाता है। खतड़वा पर्व को लेकर पहले गांवों में शाम के समय खासा उत्सव का माहौल रहता है। बच्चे गांव से दूर किसी चारागाह के किनारे पेड़ की टहनी को गाढ़ कर उसमें घास-फूस एकत्र कर लकड़ियों की सहायता से पुतला बनाते हैं। शाम को कांस की घास से बूढ़ी-बुड्ढा बनाकर उसे सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद गांव के सभी बच्चे मशाल लेकर हर घर के गोठ या खरक (गोशाला) में जाते हैं। बाद में बूढ़े को उखाड़ कर घर की छत पर फेंक दिया जाता है और बूढ़ी को खतड़वे के साथ जला देते हैं।

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स्थानीय लोग इस पुतले को जलाते हुए अपनी स्थानीय भाषा में गाते हैं “भाज खंतडवा धारे धार, गाय की जीत, खंतडवे क हार”। इस पुतले को जलाते हुए गाँव के लोग स्थानीय लोकगीत गाते हैं तथा पहाड़ी ककड़ी खाते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पुतले के पास जितने भी व्यक्ति मिलकर पहाड़ी ककड़ी खाते हैं वे सभी व्यक्ति अगले जन्म में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से मिल जाते हैं।

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इसी के साथ खतड़वे की राख का तिलक बच्चे खुद को और पशुओं को भी लगाते हैं। उत्तराखंड के गांवों में यह मान्यता भी है कि खतडुवा पर्व से प्रकृति के साथ ही पशुओं से जुड़े सभी अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

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